भारतीय संस्कृति के विकास में जैन धर्म का योगदान

भारतीय संस्कृति के विकास में जैन धर्म का योगदान

विषय पर अंतरराष्ट्रीय वेबीनार 15/7/23, शनिवार शाम 8 बजे से जूम मीटिंग आयोजित हुई।मुख्य अतिथि इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं जे.ए.एस. ऐकैडमी अहमदाबाद के निदेशक डा. नरेंद्र भंडारी के निर्देशन में अध्यक्षता सुप्रसिद्ध लेखिका डा.प्रभाकिरण जैन ने की जएएस की महासचिव डा.पूर्वी दवे के सहयोग से संयोजक शैलेंद्र कुमार जैन ने संचालन किया।

इस मीटिंग का उद्देश्य भारतीय इतिहास पुरातात्व और कला के विकास में आदिकाल से जैन धर्म के योगदान पर चर्चा कर विगत वर्षों में हुए अनेक शोध कार्यों के आलोक में भारतीय सांस्कृति के विकास में जैन धर्म के योगदान को रेखांकित कर तथ्य परक रूप से नव मूल्यांकन करना और उसको राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर के जर्नलो में प्रकाशित करना है , भारतीय इतिहास के निर्माण ने उसकी उपयोगिता और उपादेयता को प्रदर्शित तथा स्थापित करना।वरिष्ठ विद्वान डा.नरेंद्र जैन ने मंगलाचरण कर चर्चा का शुभारंभ किया,

संबंधित विषय पर जयपुर से जुडे वरिष्ठ विद्वान डा. पी.सी.जैन ने कहा कि मैंने जैन दर्शन पर 250 से जादा पी.एच.डी. कराई हैं और इसी विषय पर कई सरकार के सहयोग से कई प्रोजेक्ट पर काम किए हैं जिनको आप सब के साथ मिलकर और आगे बढाने के कार्य करेंगे और हर संभव मदद करेंगे
लखनऊ से डा.ब्रजेश रावत ने अपनी पुस्तक में सिन्धु सभ्यता और वैदिक उल्लेखों के माध्यम से किए शोध कार्य पर प्रकाश डाला,अनेक नग्न मूर्तियों का साम्य ऐतिहासिक कालीन मूर्तियो से किया जो भारत की योग वादी परंपरा की प्रतिनिधि हैं,

भारत मे दो प्रकार की परंपरा है एक योग वादी दूसरी भोग वादी ,आगरा से जुडे डा.भानु प्रताप ने फतेहपुर सीकरी पर प्रकाशित पुस्तक मे यह बताया कि अकबर से 500 साल पहले यह क्षेत्र जैन धर्म का एक बडा केंद्र था तब से लेकर आज तक एक जैन नगर है वहीं पर,संवत 1010 की मिली देवी जैन सरस्वती की प्रतिमा देश की सुंदरतम प्रतिमा है, सैकरिक्य जैन आचार्यों की बस्ती कहलाती थी,इसी विषय को आगे बढाते हुए ए.एस.आई के पूर्व अधिकारी डा.मैनुअल जोसेफ ने बताया कि मैंने अनेक लेखों में यह कहा है कि सिन्धु घाटी मिली दिगम्बर मूर्तिया और प्रतीक चिह्न जैन परंपरा से अधिक साम्य रखते हैं,लोगों को जो दिख रहा है उसे कहने में शंकोच नहीं करना चाहिए, निर्मल जैन जी कहा कि महावीर, गौतमबुद्ध ,मौर्य साम्राज्य, खारवेल आदि से जुडी कई प्रमुख धटनाओं और तिथि निर्धारित करने के विषय पर और अधिक शोध होना चाहिए जिसपर मैं अभी और काम कर रहा हुं,इसी क्रम में डा.नरेंद्र जैन ने स्व. निर्मल सेठी जी के साथ कई देशों की यात्रा कर प्रमुख तथ्यो को संग्रहित कर एक पुस्तक प्रकाशित की है,जो एक सार्थक प्रयास है, आई.ए जे.एस. के डा.श्रीनेत्र पांडे ने कहा कि मूर्तियों में लांछन लगभग दो हजार साल से मिलते हैं पहले नहीं मिलते तो दिगम्बर मूर्तियां जो मिलती हैं उनको और क्या चिह्न प्रतीक हो जिनके आधार से उसे जिन प्रतिमा सिद्ध किया जाए उनपर शोध हो,
सभी विद्वानो को सुनने के बाद डा.नरेंद्र भण्डारी ने कहा कि आप सभी ने बहुत अच्छे अपने विषयों को रेखांकित किया और सभी का प्रयास सराहनीय है,काम भी काफी हुआ है अब हमें आगे क्या करना है उस पर विचार विमर्श कर एक कार्य योजना तैयार कर उसको सुरु करना और उसे निरंतर करते रहने के लिए सबके सहयोग से सार्थक प्रयास करना चाहिए,अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य में डा.प्रभाकिरण जैन ने कहा निसंदेह आप सभी का इतिहास पुरातात्व मे महत्वपूर्ण योगदान है परन्तु इन सब का प्रचार-प्रसार बहुत कम है क्योकि मैं स्वयं लेखक हूं तो यह जानती हुं कि ऐतिहासिक पुस्तके अपने सीमित पाठको तक ही पहुंच पातीं है आप के दौर के अनुसार हमें आगे डाकूमेन्ट्री वीडियोज बनाए और शोशल मीडिया में प्रचार-प्रसार करें जो इस दौर की आवश्यकता है,उन शोध पत्रों का संग्रह कर विशेषांक के रुप मे भी प्रकाशित करना चाहिए,अंत में कार्यक्रम संयोजक,अध्यछ श्री आदिनाथ मेमोरियल ट्रस्ट शैलेंद्र जैन ने सभी का आभार प्रकट किया,