प्रकृति के साथ हो रहे “खिलवाड़” का ही नतीजा है”दरकतेपहाड़” हो या फिर “डूबते” शहर

प्रशांत कुमार श्रीवास्तव की रिपोर्ट

जैसा की हम आज बहुतायत देख रहे हैं कि “अवैध कमाई” के जुनून में “माफियाओं” द्वारा कहीं नदियों के मार्ग रोके जा रहे हैं तो कहीं पर्वतों के कटान का काम कर उन्हें “धराशायी” किया जा रहा है तो कहीं वृहद तौरपर “वृक्षों के कटान” जारी है किन्तु इस प्रकार वृक्षों की कटान,पहाड़ों के अस्तित्व को नष्ट करना,नदियों के जलस्तर को रोकना क्या प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है! जिसका “खामियाजा” आज मौसम के बदलते “रौद्र रूप” में हमारे सामने आ रहा है।
जिससे मौसम का यह रौद्र रूप कहीं ना कहीं आज “खाद्य आपूर्ति” को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है। अत्याधिक मौसमी बारिश के चलते नदियों व गहरे इलाके में आई “बेकाबू बाढ़” ने जंहा जनजीवन को अस्तव्यस्त किया है वहीं फल तथा “सब्जियों” की भी उपलब्धता एंवआपूर्ति पर ग्रहण लगा दिया है जिसके नतीजन आज सब्जियों के भाव सरेआम आसमान को छूने लगे हैं।
सब्जियों के दामों में बढ़ रही “बेतहाशा बृद्धि” को देखते हुए सरकार को आज कुछ सब्जियों में सब्सिडी देकर सस्ते दामों में बिक्रय करने के लिए मजबूर होना पड़ा बहरहाल हम इसे सरकार का “बचकाना फैसला” ही कहेंगे।
आखिर मौसम इतना उग्र रूप क्यों धारण कर रहा है कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा यह सब सीधे आमजन को प्रभावित कर रहे हैं उनकी सारी “दिनचर्या” ही बदल जा रही है और आज की स्थित तो यह है की सभी के सामने रखी थाली में “भोजन फीका” हो रहा है।
श्रावण मास यह हरियाली का महीना है और यह महीना जहाँ”अन्नदाताओं” को उनके “कृषिकार्य” करने के लिए प्रेरित करता है वहीं सूनी हो रही धरा की गोद को “वृक्षारोपड़” कर उसमें हरियाली लाने की भी प्रेरणा देता है यह सावन मास जरूर है किंतु आज कुदरत द्वारा इसके विपरीत इस पर प्रहार हो रहा है आज कहीं पर “मूसलाधार बारिष” तो कहीं पर पहाड़ों के धसकने से आम जनमानस बुरी तरह से प्रभावित है जिससे कहीं ना कहीं तन मन धन तीनों की हानि का होना हम सभी देख भी रहे हैं किन्तु इतना सबकुछ होने के बाद भी अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारता आज के जनमानस को यह सब समझाना किसी शायद किसी”पत्थर में सर मारने” जैसा ही होगा जिसके परिणाम आने वाले कल में शायद इससे भी “भयंकर” होने में कोई संदेह नहीं!